H1B_Visa_Blog_Featured_Image

भारतीय IT कंपनियों को लगेगा बड़ा झटका ! H-1B वीजा शुल्क में अब सालाना चुकाने होंगे 1 लाख डॉलर…

H-1B visa शुल्क वृद्धि : भारतीय आईटी सेक्टर पर पड़ेगा गहरा असर

अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने H-1B visa के शुल्क ढांचे में ऐतिहासिक बदलाव किया है। अब इस वीजा के लिए कंपनियों को प्रति वर्ष 1,00,000 अमेरिकी डॉलर यानी करीब 89 लाख रुपए का वार्षिक शुल्क चुकाना होगा। यह कदम अमेरिकी श्रम बाजार की संरचना को बदलने वाला माना जा रहा है। खासकर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और कंपनियों पर इसका गहरा असर पड़ेगा क्योंकि भारतीय नागरिक H-1B वीजा पाने वालों का सबसे बड़ा समूह हैं।

इस फैसले ने न केवल भारतीय आईटी सेक्टर को चिंता में डाल दिया है बल्कि उन युवा पेशेवरों के सपनों पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है जो अमेरिका में करियर बनाना चाहते थे।

H-1B visa क्या है?

H-1B visa एक नॉन-इमिग्रेंट वर्क वीजा है जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां विदेशी प्रोफेशनल्स को विशेष कौशल वाली नौकरियों के लिए नियुक्त कर सकती हैं। इसकी अवधि 3 साल की होती है और इसे अधिकतम 6 साल तक बढ़ाया जा सकता है।

  • हर साल 65,000 वीजा नियमित आवेदकों के लिए जारी किए जाते हैं।
  • 20,000 वीजा अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर डिग्री या उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों के लिए आरक्षित होते हैं।
  • भारतीय आईटी इंजीनियर और टेक कंपनियां इन वीजा के सबसे बड़े लाभार्थी हैं।

नया शुल्क ढांचा और प्रशासन की रणनीति

वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लूटनिक ने घोषणा की कि अब कंपनियों को H-1B visa के लिए 1,00,000 अमेरिकी डॉलर फीस देनी होगी। अभी तक यह लागत केवल कुछ हजार डॉलर तक सीमित थी।

प्रशासन का तर्क है कि यह बदलाव अमेरिकी कर्मचारियों को सुरक्षा देने और कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों पर कम निर्भर रहने के लिए प्रेरित करेगा। साथ ही, इसका मकसद केवल उन्हीं पदों के लिए वीजा जारी करना है जो वास्तव में उच्च कौशल और विशेषज्ञता की मांग करते हैं।

H-1B visa

प्रशासन के मुख्य तर्क

  • अमेरिकी नागरिकों के लिए अधिक रोजगार अवसर।
  • कंपनियों को प्रशिक्षुओं की जगह अनुभवी विशेषज्ञों की नियुक्ति के लिए प्रेरित करना।
  • वीजा प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाना।

भारतीय आईटी कंपनियों पर असर

भारत की अग्रणी आईटी कंपनियां जैसे इंफोसिस, टीसीएस और विप्रो लंबे समय से H-1B visa पर निर्भर रही हैं। ये कंपनियां अपने जूनियर और मिड-लेवल इंजीनियरों को अमेरिका भेजकर प्रोजेक्ट्स पर काम कराती रही हैं।

लेकिन नए शुल्क ढांचे से:

  • जूनियर स्तर के इंजीनियरों को भेजना आर्थिक रूप से अव्यवहारिक होगा।
  • कंपनियां केवल सीनियर और हाई-स्किल्ड इंजीनियरों पर ध्यान केंद्रित करेंगी।
  • भर्ती प्रक्रिया में चयनात्मकता बढ़ेगी।

लूटनिक ने स्पष्ट किया: “अब आप ट्रेनी को H-1B visa पर नहीं रखेंगे। अगर प्रशिक्षण देना है तो आप अमेरिकियों को प्रशिक्षित करेंगे।”

भारतीय पेशेवरों की चुनौतियाँ

भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स लंबे समय से H-1B visa प्रोग्राम पर अमेरिका जाकर करियर बनाने की उम्मीद रखते रहे हैं। हर साल लाखों लोग इस वीजा के लिए आवेदन करते हैं।

नई नीति से:

  • शुरुआती करियर के पेशेवरों के अवसर सीमित हो जाएंगे।
  • केवल अनुभवी और विशेषज्ञ कौशल वाले इंजीनियर ही मौका पा सकेंगे।
  • अमेरिका में रोजगार पाने का सपना और कठिन हो जाएगा।
H1-B visa

अमेरिकी बाजार और वैश्विक असर

यह बदलाव केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे वैश्विक आईटी उद्योग को प्रभावित करेगा। अमेरिकी कंपनियां जो अब तक विदेशी कर्मचारियों पर निर्भर थीं, उन्हें अपनी रणनीतियाँ बदलनी पड़ेंगी।

  • वीजा की संख्या (65,000 + 20,000) भले ही समान रहेगी, लेकिन आवेदन कम हो सकते हैं।
  • कंपनियां केवल उन्हीं पदों के लिए वीजा लेंगी जो 1,00,000 डॉलर शुल्क को उचित ठहरा सकें।
  • इससे अमेरिकी श्रम बाजार में वेतन स्तर और प्रतिस्पर्धा दोनों पर असर पड़ेगा।

भारतीय कंपनियों की भविष्य रणनीति

भारतीय आईटी सेक्टर के लिए यह स्थिति एक चुनौती और अवसर दोनों है।

  1. हाई-वैल्यू सर्विसेज की ओर रुझान: कंपनियों को ऐसे प्रोजेक्ट्स और सेवाओं पर ध्यान देना होगा जो उच्च लागत को सही ठहरा सकें।
  2. ऑनशोर-ऑफशोर मॉडल: कंपनियां अमेरिका में लोकल हायरिंग बढ़ा सकती हैं और भारत से केवल सीनियर प्रोफेशनल्स भेज सकती हैं।
  3. नवाचार और ऑटोमेशन: लागत बचाने के लिए कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन पर निवेश बढ़ा सकती हैं।
  4. नए बाजारों की तलाश: यूरोप, एशिया-पैसिफिक और मिडिल ईस्ट जैसे अन्य बाजारों में विस्तार की संभावना बढ़ेगी।

अमेरिकी प्रशासन की सोच और आलोचना

प्रशासन का मानना है कि यह कदम “अमेरिकन वर्कर्स फर्स्ट” नीति के तहत लिया गया है। इससे अमेरिकी कामगारों को प्रशिक्षण और अवसर मिलेंगे।

हालांकि आलोचकों का कहना है कि:

  • यह बदलाव अमेरिका में टैलेंट की कमी पैदा कर सकता है।
  • कंपनियों के लिए नवाचार और विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है।
  • भारतीय आईटी कंपनियों और अमेरिकी ग्राहकों के बीच लागत बढ़ सकती है।

मौजूदा H-1B धारकों पर असर

जो कंपनियां पहले से H-1B visa कर्मचारियों को नियुक्त कर चुकी हैं, उन्हें भी नवीनीकरण के समय इस नई फीस का सामना करना पड़ेगा। इससे उनका ऑपरेशनल खर्च और बढ़ जाएगा।

  • यह नियम लागू होते ही सभी नए और नवीनीकरण आवेदन प्रभावित होंगे।
  • मौजूदा कर्मचारियों के लिए भी भविष्य में स्थिति चुनौतीपूर्ण होगी।

निष्कर्ष

ट्रंप प्रशासन का यह निर्णय H-1B visa इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे भारतीय आईटी सेक्टर पर गहरा असर पड़ेगा। कंपनियों को अब अपनी कार्यप्रणाली और रणनीति बदलनी होगी।

नई नीति का स्पष्ट संदेश है – अमेरिका अब केवल उन्हीं विदेशी कर्मचारियों का स्वागत करेगा जो उच्च कौशल और विशेषज्ञता रखते हैं और जिनकी नियुक्ति अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बड़ा मूल्य जोड़ सकती है।

भारतीय कंपनियों और प्रोफेशनल्स के लिए यह समय है कि वे नई रणनीतियाँ अपनाएँ, नवाचार पर ध्यान दें और अमेरिकी बाजार के साथ-साथ अन्य वैश्विक अवसरों की ओर भी कदम बढ़ाएँ।

Scroll to Top