Maa Nanda Sunanda Mahotsav 2025

नैनीताल में मां नंदा सुनंदा महोत्सव पर्व हुआ प्रारंभ , भक्तों की उमड़ी भीड़…

नैनीताल में Maa Nanda Sunanda महोत्सव का शुभारंभ

सरोवर नगरी नैनीताल में आस्था और परंपरा का प्रतीक Maa Nanda Sunanda महोत्सव का 123वां पर्व धूमधाम से शुरू हो गया है। चोपड़ा गांव, ज्योलिकोट से लाए गए कदली (केले) के वृक्षों का स्वागत स्थानीय महिलाओं और भक्तों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों से किया। इस दौरान हजारों श्रद्धालु मौजूद रहे और शहर भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो गया।


शोभायात्रा और कदली वृक्ष का अभिषेक

नगर भ्रमण और भव्य शोभायात्रा

कदली वृक्ष को नैनीताल शहर में भव्य शोभायात्रा के रूप में घुमाया गया। इस शोभायात्रा में स्थानीय महिलाएं, स्कूली बच्चे और भक्त बड़ी संख्या में शामिल हुए। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन से पूरा नगर गूंज उठा।

मंदिर प्रांगण में अभिषेक

नगर भ्रमण के बाद कदली वृक्ष को मां नयना देवी मंदिर में लाकर अभिषेक किया गया। अब इन्हीं वृक्षों से Maa Nanda Sunanda की मूर्तियां बनाई जाएंगी। अष्टमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में इन प्रतिमाओं के दर्शन भक्तों के लिए खुले होंगे।

Maa Nanda Sunanda महोत्सव

Maa Nanda Sunanda मूर्ति निर्माण की मान्यता

कदली वृक्ष का महत्व

स्थानीय मान्यता है कि कदली वृक्ष में माता स्वयं अपना स्वरूप धारण करती हैं। मूर्ति के हंसते चेहरे को शुभ संकेत माना जाता है, जबकि गंभीर मुखाकृति आने वाले समय की कठिनाइयों की ओर इशारा करती है।

इको-फ्रेंडली रंगों का प्रयोग

पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष भी मूर्ति निर्माण में केवल इको-फ्रेंडली रंगों का उपयोग किया जा रहा है।


Maa Nanda Sunanda की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता नंदा सुनंदा अपने ससुराल जा रही थीं। तभी भैंस रूपी राक्षस ने उनका पीछा किया। वे केले के पेड़ के पीछे छिप गईं, लेकिन वहां मौजूद बकरे ने पेड़ की पत्तियां खा लीं। राक्षस ने उन्हें देख लिया और उनकी हत्या कर दी। इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष यह महोत्सव आयोजित किया जाता है।

Maa Nanda Sunanda Pratima

Maa Nanda Sunanda महोत्सव की विशेषताएं

  • 123 वर्षों से निरंतर परंपरा
  • हजारों भक्तों की श्रद्धापूर्ण भागीदारी
  • नैनीताल की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान
  • पर्यावरण और आस्था का संगम

निष्कर्ष

Maa Nanda Sunanda महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नैनीताल की सांस्कृतिक धरोहर है। यह पर्व परंपरा, आस्था और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत उदाहरण है, जो हर साल भक्तों को जोड़ता है और मां के आशीर्वाद की अनुभूति कराता है।

ठीक है 🙏
अब मैं आपको FAQ सेक्शन पूरी तरह हिंदी भाषा में लिखकर देता हूँ, ताकि इसे सीधे आपके लेख में जोड़ा जा सके।


❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. मां नंदा सुनंदा महोत्सव क्या है?

मां नंदा सुनंदा महोत्सव नैनीताल, उत्तराखंड का 123 साल पुराना पारंपरिक और धार्मिक पर्व है। इसमें मां नंदा और सुनंदा की मूर्तियों का निर्माण कर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।


2. कदली (केले) के वृक्ष का क्या महत्व है?

इस महोत्सव में मां की मूर्तियां केले के पेड़ (कदली वृक्ष) से बनाई जाती हैं। मान्यता है कि मां नंदा और सुनंदा स्वयं इन वृक्षों में अपना स्वरूप धारण करती हैं।


3. मां नंदा सुनंदा महोत्सव कब मनाया जाता है?

यह महोत्सव हर साल भाद्रपद माह (अगस्त–सितंबर) में मनाया जाता है। अष्टमी के दिन मां की प्रतिमाओं के दर्शन भक्तों के लिए खोल दिए जाते हैं।


4. मां की मूर्ति के चेहरे का क्या संकेत होता है?

मां की मूर्ति का चेहरा भविष्यवाणी का प्रतीक माना जाता है –

  • मुस्कुराता चेहरा → शुभ समय और समृद्धि का संकेत।
  • गंभीर चेहरा → आने वाले कठिन समय का संकेत।

5. यह महोत्सव कहां मनाया जाता है?

यह महोत्सव मुख्य रूप से नैनीताल के नयना देवी मंदिर परिसर में मनाया जाता है। यहां शोभायात्रा, पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है।


6. मां नंदा सुनंदा की पौराणिक कथा क्या है?

कथा के अनुसार, एक बार मां नंदा और सुनंदा अपने ससुराल जा रही थीं। तभी भैंस रूपी राक्षस ने उनका पीछा किया। मां केले के पेड़ के पीछे छिप गईं, लेकिन एक बकरे ने उसके पत्ते खा लिए और राक्षस ने उन्हें देख लिया। इसके बाद राक्षस ने उनकी हत्या कर दी। इसी घटना की स्मृति में हर साल यह महोत्सव मनाया जाता है।


7. मां नंदा सुनंदा महोत्सव का महत्व क्या है?

यह महोत्सव सिर्फ आस्था और भक्ति का प्रतीक ही नहीं बल्कि नैनीताल की सांस्कृतिक धरोहर भी है। इसमें परंपरा, धार्मिक विश्वास और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

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